
गोल सिक्कों से जुदा
चौकोर चपल चटक पंजी,
गुल्लकों में छूट के
कल बड़ा करने चली,
न छूटी हाथ से तो है लजीज गटक पंजी.
मिल गई जो गैल में
तो बनी भानुमति,
बेवजह कहीं खप गई तो खटकती खटक पंजी.
कभी अटकूँ तो अटक पंजी,
कभी लटकूँ तो लटक पंजी.
दाब लूँ पुरजोर से अपनी ,
सोच में है कब और भी लूँ झटक पंजी.
मुट्ठी में लेके सोता था
तब मेरे सपनों से बड़ी थी.
तीज, पर्व, त्योहार पे नैंग की पंजी,
शर्त, अटकल, पच्चुओं पर चेंग की पंजी,
आज भी सपनों से बड़ी हैै,
लेकिन मुँह उठाए खड़ी है.
कहीं मुझको मुट्ठी में न ले ले
और
दंड पेेले,
दफा करने इसी आगामी अकबकाई को
जेब में रखता हूँ सिफारिशी धेले.
अब चलती नहीं है पंजी,
लेकिन जहन से टलती नहीं है पंजी.
पंजी है पंचनामा मेरे कण कण का ,
पंजीपति से ही लेखा-जोखा है क्षण-क्षण का.
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जय हिंद
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