मैं खुला सीप हूँ उर्मि -मध्य लिखता आमंत्रण की पाती गुमनामी का इतिहास झाँकता जल्दी आ जाओ बन थाती .
धूमकेतु सा एक चिराग मनः पटल में छोड़े आग. उन्मीलित है प्रणय शलाका उच्छवासों में दीपक राग.
कुछ मोड़ अखर जाते हैं कहानी के, बेहिसाब इस सफ़र में जिंदगानी के.
क्या हद दर्जा क्या है आला, भ्रम पड़े जब तुमको टाला .
कोई दिलासा अब गुणा-भाग और जोड़-तोड़ करके, पीछे वाली खिड़की से मेरी उम्मीदें मोड़ करके,
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