सूरतिया चाँद की बिंदिया , सितारे नैन में निंदिया . न सकुचा दूर खड़ी होकर, मिलेगा क्या कनचढ़ी होकर .
ललित कलाएँ डालें डेरे, फुदकें बाल रूप में तेरे. सहज मखमली-सी नक्काशी, छितराती है प्राण घनेरे .
मैंने लम्बी रस्सी पायी , रस्सी लेकर दौड़ लगाई. पहुँचा मैं आँगन के पार , वहाँ पेड़ था सदाबहार.
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