छाद्मदूत ( chhadmdoot )

kavyapanthika




चाक चौबंध हैं ऊँचे घराने 
खात्मे के  लिए 
अस्त्रों की होड़ .
करते 
बैठकें  जी तोड़ .

हथियारों को खतरा बताते गला फाड़ के 
शुरुआत करने से, पल्ला झाड़ के 

मनुष्य जाति मटियामेट हो जाएगी 
खो जाएगी 
खाक होके  
कोई इसे रोके

 मेरे अस्त्र शांति के लिए 
तुम्हारे क्रांति के लिए 
"किसी और के किसी और की भ्रान्ति के लिए" 

सबका अपना रोना है
इस चुहुलबाजी से क्या होना है  
जुबाँ पर आता है हिरोशिमा-नागासाकी 
लेकिन असली बात अभी है बाकी 

बर्बरता, खुंखारपना ,
जाहिलता, राक्षसत्व,

 नहीं हैं तकनीक के भरोसे
कोई अन्दर की बात तो परोसे 

बम से कम 
तलवार थी 
मुंडी कटती थी लाखों की  
तलवार से बद्तर 
पत्थर,
फोड़े जाते थे सिर 
पत्थर के भ्रूण 
नाख़ून 
फाड़ देते थे सीना 
नाख़ून से पहले .....
और पहले.....
अन्दर की पशुता 
रूप धरा  करती थी हिंसक !

आज वही हिंसा 
लिपी पुती तकनीकों से 
  क्रूर रूप धरे है नाना  
लेकिन हमने माना 
एटम का गट्ठा 
नहीं करें इक्ट्ठा 

तो 
बला टल जाएगी 
हमारी अवहेलना हमें छल जाएगी.
पता नहीं था 
शायद पता नहीं है

अन्दरुने में समायी वृत्तियों को कुचलना होगा. 
नाख़ून-पत्थर-तलवार-बम 
ख़त्म करना 
केवल 
छलना होगा.

उठो और तलाशो
प्राण वायु
 छटपटा रही है 
 दीर्घ आयु .

जरुरत होगी तो निगल जाओगे 
सूरज को हनुमान सा 
सिर्फ दिखावे के लिए पंख जला बैठोगे 
बनके जटायु .
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जय हिन्द 


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